अमेरिका के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने "इंडिया टुडे ब्रिक्स राउंडटेबल 2026" में कहा कि भारत‑चीन सहयोग से एक नया विश्व क्रम तैयार किया जा सकता है, खासकर जब अमेरिका लगातार अस्थिर हो रहा है।
सैक्स ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आम धारणा के विपरीत भारत की सफलता में चीन की बड़ी भूमिका है, और यही कारण है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल के ब्रिक्स समिट के लिए दिल्ली आ रहे हैं। भारत 12‑13 सितंबर को नई दिल्ली में अपने चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक भी होगी। यह शी का सात साल में पहला भारत दौरा है, जो गलवान सीमा पर हुई हिंसक टकराव के बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे‑धीरे सुधार का संकेत देता है।
सैक्स ने कहा, "एशिया की दो बड़ी ताकतें—भारत और चीन—अगर करीबी सहयोग करें तो एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय वैश्विक सिस्टम बन सकता है।" उन्होंने आगे कहा कि भारत को QUAD (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) छोड़ कर चीन के साथ संबंध मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि QUAD का मूल उद्देश्य इंडो‑पैसिफिक में चीन के प्रभाव का मुकाबला करना था।
"भारत की सफलता में चीन की बहुत बड़ी भागीदारी है। अमेरिका चीन पर दबाव बना रहा है, लेकिन यह काम नहीं करेगा। अब अमेरिका अपनी मनमानी नहीं कर सकता," सैक्स ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की तरक्की के लिए चीन को काउंटर करना आवश्यक नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच सहयोग को गहरा करना चाहिए। सीमा विवाद और पाकिस्तान‑चीन संबंधों से जुड़ी चिंताओं को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, "भारत तेज़ी से विकास की राह पर है, और उसे चीन से कोई खतरा नहीं है।"
सैक्स ने यह भी मान लिया कि चीन अकेले वैश्विक नेता बन नहीं सकता। "चीन ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह ब्रिटेन या अमेरिका की तरह दुनिया को चला सके। हम कई ताकतों वाली दुनिया में हैं, जिनमें भारत एक प्रमुख शक्ति है," उन्होंने कहा। इस कारण भारत‑चीन साझेदारी को नया विश्व क्रम बनाने में अहम माना गया।
सैक्स ने कहा कि "दुनिया का सबसे बड़ा खतरा अमेरिका का भ्रम है।" उन्होंने बताया कि आज हम एक बहुध्रुवीय दुनिया में हैं, जहाँ अमेरिका की एकतरफ़ा सोच खतरनाक है। भारत को अब चार महाशक्तियों में से एक के रूप में अकेले दबदबे के लिए नहीं, बल्कि सहयोग के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने अमेरिकी हस्तक्षेप पर भी सवाल उठाते हुए कहा, "अमेरिका को किसी देश को यह नहीं बताना चाहिए कि वह किन देशों के साथ व्यापार कर सकता है। ब्रिक्स को यह संदेश देना चाहिए कि हम पश्चिम‑विरोधी नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद‑विरोधी हैं।"
ब्रिक्स समिट की तैयारी में सैक्स ने तीन प्राथमिकताएँ बताई:
पहला, ब्रिक्स को बहुपक्षीय व्यवस्था, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सुदृढ़ करना चाहिए और एकतरफ़ा दबदबे वाली विश्व व्यवस्था के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
दूसरा, ब्रिक्स को अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध से पीछे हटने और एकतरफ़ा सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करने के लिए कहना चाहिए।
तीसरा, एक मल्टी‑करेंसी भुगतान प्रणाली स्थापित करने की मांग की गई, जिससे अमेरिका की एकतरफ़ा प्रतिबंध लगाने की क्षमता को सीमित किया जा सके।
सैक्स का निष्कर्ष यह है कि भारत‑चीन साझेदारी, ब्रिक्स के समर्थन से, नई वैश्विक व्यवस्था को पुनः आकार दे सकती है और दुनिया को अधिक न्यायसंगत, बहु‑ध्रुवीय दिशा में ले जा सकती है।
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