कैसा लगता होगा जब बिल्डिंग भरभराकर गिरती होगी. ईंट-सीमेंट की बनी दीवारें गिरती हैं तो मैं तो धुएं के गुबार से ही दम तोड़ दूं. हे भगवान, सत्य निकेतन में रहने वालों ने कैसा फील किया होगा? दिमाग में ऐसी तमाम बातें लगातार चल रही थीं, फिर बिस्तर से उठकर पानी पिया, फेस पर नाइट क्रीम लगाई. और रात के करीब 9.30 पर ही ये सब सोचते सोचते सो गई.
अभी नींद के आगोश में गए एक घंटा ही हुआ होगा तभी अचानक भड़ाम की ऐसी आवाज हुई जैसे कोई आतंकी हमला हुआ हो. मैं और मेरी दोस्त दोनों घबराकर उठ गए. दिल मानो 600 किमी प्रतिघंटा की स्पीड से चल रही ट्रेन की तरह कांप रहा था. कुछ ही देर में नीचे के फ्लोर से आवाज आई कि बाथरूम की छत नीचे आकर गिरी है. ये बाथरूम मेरा था, इसे होनी ही कहेंगे कि हम दोनों में से कोई उस वक्त बाथरूम में नहीं था...
काल्पनिक कहानी नहीं... आपबीती
आपको बता दूं कि ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं है. ये मेरी आपबीती है. यूपी के शहर से आकर दिल्ली और नोएडा की पीजी में जीवन बिताते बिताते मुझे तीन साल हो चुके हैं. पीजी में मौत के डर ने इतना पहले कभी नहीं डराया था जितना इस बार... बड़े शहरों में आकर पढ़ाई-नौकरी का सपना देखने वाली मैं आज जैसे जिंदगी या मौत चुनने के विकल्पों पर सोचने लगी थी. ये घटना मैं इसलिए साझा कर रही हूं ताकि पीजी से लेकर प्रॅापर्टी डीलिंग, किचन सर्विस या हमसे जुड़े कोई भी करने वाले आम शहरी भी हमारी तकलीफों को समझें और हमें कस्टमर समझने के बजाय इंसान समझें.
अब आगे की बात बताती हूं. दरअसल ये घटना 7 सितंबर की है. जब नोएडा स्थित मेरे पीजी में रात करीब 10.30 एक ऐसी ही घटना हुई जिसने मुझे भी डरा दिया. हालांकि, रात का समय था तो, ज्यादा हल्ला नहीं मचा. मैं और मेरी रूममेट सुबह ड्यूटी जाने के कारण जल्दी जगते हैं. इसलिए दिन भर की भागदौड़ और काम से थककर सोए ही थे कि तब ही कमरे में तेज आवाज गूंजी. पता चला बाथरूम की छत नीचे गिर गई है.
मुझे याद है...
मुझे याद है जब पहली बार इस शहर में आई थी तो मेरे पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था. पापा का बजट भी लिमिटेड था क्योंकि वो पहले ही लाखों में मेरी फीस चुका चुके थे. यहां आकर अच्छे पीजी या फ्लैट की तलाश में कई बार पूरा दिन गुजार दिया. इस खोज ने मुझे बोध कराया कि अगर इस शहर में आपको अच्छा पीजी मिल गया तो, आप लकी हैं... इस तरह मुझे पीजी मिल गया था. तब से कभी खाने का इश्यू तो कभी सुरक्षा का इश्यू तो कभी किराया बढ़ाने का इश्यू... कई बार ठिकाना बदलना पड़ा था.
करीब 1.5 साल पहले ये पीजी मिला जहां का खाना अपेक्षाकृत दूसरे पीजी हॉस्टल्स से बेहतर था और मोरल पुलिसिंग जैसे हर बात पर रोक-टोक भी कम थी. इन सुविधाओं के एवज में हर महीने करीब 8 हजार रुपये दे रही हूं. लेकिन जब से बाथरूम की छत नीचे धंसी है मन में बसा डर और गहरा गया है. ऐसा लगता है कि अगर यहां से दूसरे पीजी गए तो और तरह की दिक्कतें न हों. कहीं वहां भी ऐसा कुछ न हो जाए. मन में फिर सुरक्षा, साफ-सफाई,खाना-पानी, बिजली, इंटरनेट, शोर और प्राइवेसी से जुड़े कई सवाल सामने खड़े हो गए. दिल में रह रहकर बस यही ख्याल आता है कि काश, नौकरी करके इतना कमा लूं कि एक किराये का बड़ा फ्लैट लेकर उसमें खाने पीने का इंतजाम करा सकूं, लेकिन इस शहर में महंगाई और कमाई के बीच का फासला इतना ज्यादा है कि ये दूरी भरते देखना भी ख्वाब लगता है.
दिल कहता है कि काश ऑफिस से लौटने के बाद आराम के लिए शांत माहौल वाला कोई ऐसा ठिकाना मिल जाए जहां साफ-सफाई या खाने की समस्या न हो. जहां पानी-बिजली से जुड़ी परेशानी और प्राइवेसी की कमी बिल्कुल न हो. वैसे भी हम बाहर से आए नौकरी करने वाले युवाओं के लिए PG सिर्फ रहने की जगह नहीं होता. यहां हम अपनी नींद और मानसिक शांति की भी कई बार बलि चढ़ाते हैं ताकि अगले दिन काम पर जा सकें.
अब ऐसा लगता है जैसे इन बड़े शहरों की बहुमंजिला इमारतों की चकाचौंध के पीछे हमारे जैसे छोटे शहरों से आए युवाओं का कोई वजूद ही नहीं है. हम हर महीने की पहली तारीख को चुपचाप भारी-भरकम किराया थमा देते हैं, लेकिन बदले में हमें मिलती है सिर्फ सीलन भरी दीवारें, असुरक्षा और बात-बात पर समझौते करने की मजबूरी. जब मालिक से उस टूटी छत की शिकायत की, तो उसका ढीला-सा जवाब याद है, 'हो जाता है कभी-कभी, मिस्त्री आकर ठीक कर देगा, इतना पैनिक क्यों कर रही हो?' उस पल अहसास हुआ कि उनके लिए यह सिर्फ ईंट-पत्थर का मामूली नुकसान है, लेकिन उस छत के ठीक नीचे हमारी जिंदगी और वो उम्मीदें थीं जो हमारे घरवाले हमें इस शहर में भेजते वक्त अपनी आंखों में सजाते हैं.
रात को जब भी आंख लगती है, तो पंखे की हल्की सी गड़गड़ाहट भी किसी अनहोनी का अहसास कराकर अचानक से नींद उड़ा देती है. सुबह उठकर बेसिन के पास खड़े होकर मुंह धोते हुए भी नजरें बार-बार ऊपर छत की दरारों पर ही टिकी रहती हैं कि कहीं कोई दूसरा हिस्सा न गिर जाए. जिस शहर में अपनी पहचान बनाने और अपने सपनों को पूरा करने आए थे, वहां अब हर रात सिर्फ इस दुआ के साथ बितानी है कि कल की सुबह सलामत देखने को मिल जाए. अपने ही कमरे में, जिसके लिए हम अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चुकाते हैं, एक अजीब सा बेगानापन और खौफ महसूस होता है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने ऐसी रातों का सामना किया हो.
कभी-कभी लगता है कि हम इस महानगर के विशाल सिस्टम में सिर्फ किराए की रसीदों के आंकड़े भर बनकर रह गए हैं. हम सह लेते हैं खराब खाना, सीलन की बदबू, पानी की किल्लत और बिना बताए किराया बढ़ा दिए जाने का अमानवीय रवैया, सिर्फ इसलिए कि सिर पर एक छत बनी रहे. लेकिन जब वही छत जान लेने पर आमादा हो जाए, तो दिल टूट जाता है. काश, पीजी चलाने वाले प्रॉपर्टी डीलर्स और मकान मालिक यह समझ पाते कि वे हमें सिर्फ चार दीवारें किराए पर नहीं देते, बल्कि एक इंसान की सुरक्षा और उसकी दिमागी शांति की जिम्मेदारी भी लेते हैं. हम यहां सिर्फ ग्राहक बनकर नहीं आए हैं, हम भी किसी की बेटियां हैं, किसी के बच्चे हैं, जिनकी जिंदगी की कीमत इन किराए के मकानों से कहीं ज्यादा है.
Comments ()
Be the first to share your perspective on this story!