१८ साल पहले मेरठ के माधवपुरम में एक छोटी सी बल्ला फैक्ट्री में मैं पहली बार विराट कोहली से मिला। वह अभी-अभी अंडर‑19 विश्व कप जीतकर भारत को चैंपियन बना रहा था और अंतरराष्ट्रीय डेब्यू की तैयारी में था।
फैक्ट्री में प्रवेश करने के बाद मैंने उन्हें देखा – न मूंछ, न दाढ़ी, सिर्फ एक युवा क्रिकेटर जिसका चेहरा सपनों से भरा था। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “मुझे खुद को साबित करना है”, और यह वाक्य आज तक मेरे साथ है।
वह समय था जब दिलीप वेंगसरकर, तब के मुख्य चयनकर्ता, ने विराट को पहली बार १५ साल की उम्र में देखा था। दिल्ली की अंडर‑16 टीम में कोलकाता‑मुंबई के खिलाफ उनका प्रदर्शन वेंगसरकर को प्रभावित कर गया, और यही नजरिया बाद में उन्हें राष्ट्रीय टीम तक पहुँचाने में मददगार बना।
अंडर‑19 विश्व कप जीतने के बाद विराट को २००८ के IPL के पहले सीजन में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) ने बुलाया। हालांकि उनका शुरुआती प्रदर्शन उल्लेखनीय नहीं रहा (१२ पारियों में ३८ रन), लेकिन यह अनुभव उनके करियर का पहला बड़ा कदम था।
२००८ में वेंगसरकर ने उन्हें इमर्जिंग प्लेयर्स टूर्नामेंट में भी चुना। १८ जुलाई को न्यूजीलैंड की इमर्जिंग टीम के खिलाफ उन्होंने नाबाद १२० रन बनाकर भारत को जीत दिलाई – इस पारी ने चयनकर्ता का भरोसा और मजबूत कर दिया।
अगले महीने, ७ अगस्त को, भारत की श्रीलंका दौरे की घोषणा हुई। विराट को १६ सदस्यीय वन‑डे स्क्वाड में जगह मिली और वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने वाले थे। इस यात्रा से ठीक पहले वह मेरठ पहुँचे, जहाँ उन्हें नया बल्ला चाहिए था।
मेरठ का बल्ला उद्योग देशभर में मशहूर है, और विराट का कोच राजकुमार शर्मा ने बीडीएम (B.D.M.) के प्रतिनिधियों से उनके लिये सालाना दो‑दो बल्ले उपलब्ध कराए थे। यह रिश्ता उनके करियर के शुरुआती दिनों में काफी मददगार रहा।
फैक्ट्री में प्रवेश के बाद कुछ स्थानीय फ़ोटोग्राफ़र भी मौजूद थे, लेकिन यह कोई औपचारिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं था। लगभग आधे घंटे की बातचीत में विराट ने अपने लक्ष्य, ध्येय और टीम में जगह बनाना कितना चुनौतीपूर्ण होगा, इस पर खुलकर बात की।
मैंने उनसे पूछा कि वह महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में खेलने को लेकर क्या सोचते हैं। विराट ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे खुद को साबित करना होगा, अपना १०० % देना होगा।” यह जवाब उनके आगे के सफर की झलक था – लगातार खुद को बेहतर बनाने की जिद।
उसी दौरान मैंने उनसे युवराज सिंह के टैटू के बारे में भी पूछा, तो उन्होंने कहा, “नहीं भइया, मैं अपने खेल पर फोकस करूंगा।” उनके शब्दों में स्पष्टता और सादगी थी – क्रिकेट ही प्राथमिकता थी।
१८ अगस्त २००८ को दांबुला में श्रीलंका के खिलाफ उनका वन‑डे डेब्यू हुआ। शुरुआती पारी में केवल १२ रन ही बन पाए, लेकिन उसके बाद का सफर असाधारण रहा। धीरे‑धीरे वे भारत के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ों में से एक बन गए, टेस्ट, ODI और T20 में निरंतर बड़े स्कोर बनाते रहे।
विराट ने बाद में कप्तानी की जिम्मेदारी भी संभाली, भारतीय टीम को नई आक्रामक शैली दी और रिकॉर्ड‑ब्रेकिंग शतकों की लड़ी शुरू की। उनके नाम पर अब “किंग कोहली” का उपनाम भी जुड़ चुका है।
आज ३८ साल की उम्र में विराट कोहली न सिर्फ भारतीय क्रिकेट का चेहरा हैं, बल्कि विश्व स्तर पर भी उनका प्रभाव गहरा है। मेरठ की उस बल्ला फैक्ट्री में हुई छोटी सी मुलाकात ने हमें एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी सुनाई, जिसने खुद को साबित कर दिखाया और पूरी दुनिया को अपना ‘किंग’ बना दिया।
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