कार बनाने वाली एक मशहूर कंपनी 1 लाख कर्मचारियों की नौकरी ख् वाली है। ब्लूमबर्ग की खबर के मुताबिक फॉक्सवैगन के सीईओ ओलिवर ब्लूम मंगलवार को कंपनी के कर्मचारियों के सामने लागत घटाने और कंपनी का आकार छोटा करने की अपनी योजना रखेंगे। इस योजना के तहत करीब 1 लाख नौकरियों पर असर पड़ने की आशंका है। ब्लूम की पहली बड़ी बैठक वोल्फ्सबर्ग की मुख्य फैक्ट्री में होगी। इसके बाद जर्मनी की दूसरी फैक्ट्रियों में भी कर्मचारियों के साथ बैठकें होंगी।
कंपनी की योजना ऐसे समय सामने आई है, जब फॉक्सवैगन की बिक्री और मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है। चीन में बिक्री कमजोर हुई है, जर्मनी में उत्पादन लागत बढ़ी है और कई फैक्ट्रियां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं। इससे कंपनी अपने कई प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में करीब 30 फीसदी ज्यादा लागत उठा रही है। प्रबंधन का अनुमान है कि कम से कम 10 अरब यूरो की अतिरिक्त लागत में कटौती करनी होगी।
फॉक्सवैगन यूरोप में अपनी सालाना उत्पादन क्षमता को करीब 5 लाख वाहनों तक कम करने की योजना बना रही है। इसके साथ अधिकारियों की संख्या घटाने, कारों के मॉडल और उनके अलग-अलग विकल्पों की संख्या कम करने पर भी विचार किया जा रहा है।
कंपनी का तर्क है कि इलेक्ट्रिक वाहनों, सॉफ्टवेयर और चीन की तेजी से बदलती ऑटो इंडस्ट्री ने कारोबार का पुराना मॉडल बदल दिया है। ऐसे में लागत घटाए बिना कंपनी के मुनाफे में सुधार करना मुश्किल होगा। ब्लूम का लक्ष्य कंपनी के मुनाफे का मार्जिन बढ़ाकर करीब 9 फीसदी करने का है।
मैनेजमेंट की योजना को लेकर कर्मचारियों और यूनियन नेताओं में नाराजगी है। आईजी मेटल की प्रमुख क्रिस्टियाने बेनर ने 9 फीसदी मुनाफे के लक्ष्य को ‘सपनों की दुनिया’ बताते हुए खारिज किया है। एक स्थानीय यूनियन नेता ने चेतावनी दी है कि अगर ब्लूम ने अपनी योजना वापस नहीं ली तो हड़ताल तक की नौबत आ सकती है।
यूनियन नेताओं का कहना है कि कंपनी की सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रिक कारों और चीन की रणनीति से जुड़ी गलतियों का बोझ अब कर्मचारियों पर डाला जा रहा है। फॉक्सवैगन की प्रमुख श्रम प्रतिनिधि डैनियला कैवालो ने भी सभी जर्मन प्लांट्स के कर्मचारियों को भविष्य में रोजगार की सुरक्षा का भरोसा देने की मांग की है।
फॉक्सवैगन के लिए बदलाव लागू करना आसान नहीं होगा। कंपनी में यूनियनों का प्रभाव काफी मजबूत है। इसके अलावा लोअर सैक्सनी राज्य की भी कंपनी में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है और कई अहम फैसलों पर उसका प्रभाव रहता है।
कैसल यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर वोल्फगैंग श्रोएडर के मुताबिक, ब्लूम के सामने विरोध करने वाले कई समूह हैं और कई ऐसे पक्ष भी हैं जिनके पास फैसलों को रोकने की ताकत है, जबकि उन्हें समर्थन देने वाले कम हैं।
फॉक्सवैगन की प्रमुख शेयरधारक कंपनी पोर्शे एसई ने भी प्रबंधन से तेजी से कदम उठाने को कहा है। उसका कहना है कि फॉक्सवैगन ‘ऐतिहासिक चौराहे’ पर खड़ी है। पोर्शे-पीएच परिवार के लिए भी कंपनी की घटती कमाई चिंता का विषय है। फॉक्सवैगन और पोर्शे एजी के कमजोर मुनाफे का असर लंबे समय से मिलने वाले लाभांश पर पड़ रहा है। इसलिए परिवार प्रबंधन से कारोबार को जल्द पटरी पर लाने की उम्मीद कर रहा है।
ओलिवर ब्लूम को फॉक्सवैगन के नेतृत्व में इसलिए लाया गया था, क्योंकि उन्हें कंपनी के अलग-अलग ताकतवर समूहों के बीच समझौता कराने वाला व्यक्ति माना जाता है, लेकिन अब वही क्षमता उनकी सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है।
एक तरफ प्रबंधन कंपनी की लागत और उत्पादन क्षमता घटाना चाहता है, दूसरी तरफ यूनियन रोजगार बचाने की मांग कर रही है। शेयरधारक तेजी से मुनाफा सुधारना चाहते हैं और कंपनी को इलेक्ट्रिक कारों, सॉफ्टवेयर तथा चीन की बदलती प्रतिस्पर्धा के अनुरूप ढलना है।
ऐसे में आने वाले दिनों में कर्मचारियों के साथ ब्लूम की बैठकें सिर्फ लागत कटौती की योजना समझाने तक सीमित नहीं रहेंगी। इन बैठकों से यह भी तय होगा कि फॉक्सवैगन अपने सबसे बड़े बदलाव को बिना बड़े श्रमिक संघर्ष के लागू कर पाएगी या नहीं।
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