इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति प्राप्त कर पूर्व नियुक्ति रद्द होने की जानकारी छिपाने के आरोप में बर्खास्त सहायक अध्यापक को बड़ी राहत दी। न्यायालय ने कहा कि नियुक्ति रद्द करना सेवा से बर्खास्तगी के बराबर नहीं माना जा सकता और जिस तथ्य को अभ्यर्थी से बताने के लिए कहा ही नहीं गया हो, उसे छिपाने का दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता। इस आधार पर, संत कबीर नगर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा 20 अप्रैल 2019 को जारी सेवा समाप्ति आदेश को न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने रद्द कर दिया।
यह मामला 2015 में विज्ञान और गणित विषय के 29,334 सहायक अध्यापकों की भर्ती से जुड़ा है। अनिल कुमार का चयन हुआ और 21 सितंबर 2015 को उन्हें गणित के सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 24 सितंबर को कार्यभार ग्रहण किया और एक वर्ष बाद उनकी सेवाएं स्थायी कर दी गईं।
करीब तीन वर्ष बाद, 2018 में, शिकायत की गई कि उन्होंने फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्ति हासिल की है। इसके बाद उनका वेतन रोका गया। हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2018 को वेतन रोकने के आदेश पर रोक लगा दी थी। जांच में हाईस्कूल, इंटर और बीएससी के प्रमाणपत्र सही पाए गए, जबकि बीएड की अंकतालिका के सत्यापन की रिपोर्ट लंबित थी। इसी बीच 20 अप्रैल 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में छात्रों के इस्लामिक प्रार्थना करने और विशेष समुदाय का संकेत देने वाली वर्दी पहनने के आरोप में निलंबित शिक्षक को अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने निलंबन आदेश को विभागीय जांच पूरी होने तक स्थगित रखने का निर्देश दिया है और जांच को कानून के अनुसार जल्द पूरा करने तथा अधिमानतः 15 दिन में समाप्त करने को कहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने मोहम्मद अजहर की याचिका पर दिया है।
याची ने संभल के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से 10 मई 2026 को जारी निलंबन आदेश को चुनौती दी थी। आरोप था कि प्रभारी प्रधानाध्यापक रहते हुए उनके कार्यकाल में छात्र इस्लामिक प्रार्थना करते थे और ऐसी वर्दी पहनते थे, जिससे उनके विशेष समुदाय से संबंधित होने का संकेत मिलता था। सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने कहा कि जिस अवधि की घटनाओं का आरोप लगाया गया है, उस दौरान शिक्षक अस्पताल में भर्ती थे और उन्हें स्वीकृत चिकित्सकीय अवकाश मिला था। इसलिए वह कथित प्रार्थना के समय विद्यालय में मौजूद नहीं थे।
विभाग की ओर से बताया गया कि 3 सितंबर 2026 को आरोपपत्र तैयार किया गया और 7 सितंबर को याची को सौंप दिया गया। विभाग ने कुछ अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि 14 नवंबर 2025 से पहले याची को छात्रों की प्रार्थना सभा में मौजूद दिखाया गया है।
कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर आरोपों की सत्यता की जांच नहीं की जा सकती। याची अपने बचाव में चिकित्सकीय अवकाश और अन्य दस्तावेज विभागीय जांच के दौरान पेश कर सकते हैं। जांच में उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा। कोर्ट ने विभागीय जांच को कानून के अनुसार तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का निर्देश दिया। साथ ही सभी संबंधित दस्तावेज याची को तीन दिन के भीतर उपलब्ध कराने को कहा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने तक निलंबन आदेश स्थगित रहेगा और उसका प्रभाव जांच के अंतिम परिणाम के अधीन होगा। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
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