उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बड़ा दांव खेल दिया है। समाजवादी पार्टी की अब तक पहचान बनी लाल टोपी तो रहेगी ही इसके यूथ विंग यानी छात्रसभा के कार्यकर्ता नीली ड्रेस में भी नजर आएंगे। समाजवादी छात्र सभा के कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी ने नई ड्रेस निर्धारित कर दी है। इसके कार्यकर्ता अब नीली पैंट और नीली शर्ट या नीली जीन्स और नीली टी-शर्ट पहनेंगे। टीशर्ट पर सपा छात्र सभा का लोगो और सपा का चुनाव निशान साइकिल बनी हुई है।
यूं तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लखनऊ से लेकर दिल्ली और सारे देश में लाल गमछा और सिर पर लाल टोपी पहने नजर आते हैं। यह सपा नेताओं के लिए एक तरीके से ड्रेस कोड की तरह है। पार्टी के निशान और झंडे की तरह इससे भी सपाइयों को पहचान मिलती है। लेकिन पिछले 31 अगस्त को अखिलेश यादव भी नीला गमछा डाले नजर आए थे। लखनऊ में समाजवादी पार्टी के जिला और महानगर अध्यक्षों की बैठक में सपा मुखिया ने गले में लाल की जगह नीला गमछा डाल रखा था। उनके अलावा शिवपाल सिंह यादव भी उस दिन नीले गमछे में थे।
अब सपा ने अपनी स्टूडेंट विंग छात्र सभा का ड्रेस कोड बदला है तो इस यूनिफॉर्म पॉलीटिक्स पर जोर-शोर से सियासी कयासबाजियां चल पड़ी हैं। दरअसल, नीले रंग को यूपी की सियासत में अभी तक दलित आंदोलन और बसपा से जोड़कर देखा जाता रहा है। बसपा के झंडे का रंग भी नीला है। ऐसे में यूपी चुनाव के करीब अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के इस ‘नीला प्रेम’ को दलित वोटरों को रिझाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
अखिलेश यादव ने यूपी की सियासत में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर पिछले कुछ चुनावों से सपा को बढ़त दिलाने की कोशिश की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा की कामयाबी को कुछ हद तक इस पीडीए फॉर्मूले की सफलता भी माना गया। राजनीति के जानकारों का कहना है कि सपा ने जिस तरह के सामाजिक समीकरण को लोकसभा चुनाव दौरान यूपी में में अपने प्रचार अभियान का आधार बनाया उसका उसे सीधा फायदा मिला। उस चुनाव में सपा को यूपी में सबसे अधिक 37 सीटें मिलीं जबकि भाजपा को 33 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
हालांकि तबसे अब तक अखिलेश यादव खुद पीडीए की कई बार अलग-अलग तरह की व्याख्याएं पेश कर चुके हैं। हाल में उन्होंने पीडीए के पी को ‘पंडित’ बताकर ब्राह्मण वोटरों को रिझाने की कोशिश की थी। अब जब 2027 का चुनाव करीब है तब अखिलेश यादव नए ढंग से अपने पीडीए फॉर्मूले और इसकी व्याख्या को चुनावी कसौटी पर कसने लगे हैं। इसके साथ ही वे हर वो दांव आजमा रहे हैं जिससे समाज के अलग-अलग वर्गों को सपा के साथ जोड़कर भाजपा का मुकाबला किया जा सके। छात्र सभा के लिए नीला ड्रेस कोड को इसी तरह की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
जानकारों का कहना है कि अखिलेश यादव को पीडीए फॉर्मूले और नीले रंग में भविष्य की राह नजर आने लगी है। यूपी की राजनीति में दलित वोटरों का एक बड़ा वर्ग बसपा के साथ रहा है। वहीं गैर जाटव दलित और गैर यादव पिछड़ा वर्ग बीजेपी के साथ मजबूती से रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्मूले के चलते इस समीकरण में काफी चेंज देखने को मिला। सपा ने दलितों और पिछड़ों के एक वर्ग को अपनी ओर खींचा। अब अखिलेश उसी आधार को विधानसभा चुनाव में अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं।
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